उठू उठू ने कनिया , भगेल भोर !
कौवा कोइलीया ,मचाबाई छै सोर. !
कतेक सुतब ,आब घरक काजमे करु ने कनि जोर !
उठू उठू ने कनिया , भगेल भोर. !
स्नान कैरके पूँजा पाठ नै करब ओर !
देखु , मकैके खोलमा मे मैना करैछई खेलोर !
आजुक आहराकलेल करैछई ,सुभक सङ्घओर !
आबो त उठू , कहैछी यौ भगेलछै भोर !
देखू ने सुरजके लाली आबैछैक ,अपने सबके ओर !
भोरक लाली लगेला से, देहिया होइछैक बल्जोर !
चलू ने कनि दौर आबैछी ,नै बहुत त थोर वो थोर !
हे सुनुने , कहैछी उठू ने, कनिया भगेल भोर !
परोसिया टोलाके मुरग्वा ,करलागल छैक सोर !
मन्दिरके पुजारीबाबा सेहो ,घन्टी बजाबैछई बहुत जोर !
यौ , सुनैछी कि फेनो सुइतरहलि कनि ओर !
लिय, आब नै सुनाइब हम कविता ,अहा भजाइछि बोर !
लेखक :- सन्तोष सिंह
गोलबजार नं.पा. १०, (डण्डाटोल) ( सिरहा
(हाल:न्युयोर्क, अमेरिका कार्यरत)